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एच-१बी वीजा पर ट्रंप प्रशासन के आंकडे गलत : थिंक टैंक

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप पद संभालने के बाद से ही एच-१बी विजा की व्यवस्था पर हमलावर रहे है और उसकी समीक्षा की बात करते रहे है । उनका मानना है कि इसके चलते अमेरिका में काम कर रही भारतीय आईटी और बीपीओ कंपनियो कंपनियो स्थानीय लोगो की बजाय कम वेतन पर भारत के लोगो को तरजीह दे रही है । लेकिन, अमेरीकी थिंक टैक ने ही राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के इस दावे को गलत करार दिया है । अमेरिकी थिंक टैंक नैशनल फाउंडेशन फोर अमेरिकन पोलिसी का कहना है कि एच-१बी वीजा के तहत काम करने वाले लोगो की ट्रंप प्रशासन के दावे के मुकाबले काफी कम है । ट्रंप प्रशासन की और से पेश किए गए डेटा के मुताबिक एच-१बी वीजा पर काम करने वाले ज्यादातर लोगो को अमेरिका में तय मजबुरी दरों से काम पर रखा जा रहा है । बीते कई महीनो से अमेरिका में एच-१बी वीजा की व्यवस्था की समीक्षा किए जाने को लेकर विवाद जारी है । इस व्यवस्था को कमजोर करने के लिए ट्रंप ने बाय अमेरिकन, हायर अमेरीकन पोलिसी की शरुआत की है । ट्रंप प्रशासन के अधिकारियो का कहना है कि एच-१बी वीजा पर आने वाले विदेशी लोगो को अमेरिकीयो की तुलना में कम सैलरी पर रखा जाता है । इसके चलते एंप्लोयर अधिक सैलरी मांगने वाले अमेरिकीयो को नजरअंदाज कर रहे है । हालांकि नैशनल फाउंडेशन फोर अमेरिकन पोलिसी की और से किए गए अध्ययन में कहा गया है कि यह डेटा गलत है और इसके मुकाबले काफी कम संख्या में लोग एच-१बी वीजा के तहत यहां है । स्टडी के मुताबिक, यह आंकडा भ्रमित करने वाला है क्योकि यह डिपार्टमेन्ट ओफ लेबर के डेटाबेस पर आधारित है, जिसमें एक ही व्यक्ति की अलग अलग ऐप्लिकेशंस को गिन लिया गया है । इसकी वजह यह है कि नए इलाके में जाने के लिए आवेदको को अलग से आवेदन करना होता है । स्टडी में बताया गया है कि एच-१ बी वीजा पर आने वाले ज्यादातर युवा वर्कर्स को अलग अलग ओफिसो में जाना पडता है और उनकी गिनती एक, दो या तीन बार तक हो जाती है । स्टडी में कहा गया है कि वर्कर्स की संख्या के साथ ही सरकारी डेटा में उनकी सैलरी के आंकडे भी गलत है । स्टडी के मुताबिक सरकारी आंकडे ८० पर्सेंट तक गलत हो सकते है ।

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